
जी ले ज़िंदगी ज़रा ज़रा
कुछ पीछे छूट रहा है
मुड़के अब तू क्या देख रहा है; क्या ढूँड रहा है ।
समेट ले यह यादें बीतें दिनों की ; कुछ खट्टी , कुछ मीठी।
देख! आगे आने वाला पल तेरी राह तक रहा है।
बना दे इसे भी खूबसूरत और हसीन अपनी शोख़ अदाओं से ।
सीख ले तू भी जीना ज़रा ज़रा इन लम्हों में।
ज़माने को भी बना दे दीवाना ; हो ऐसा जीने का अंदाज़ ।
ना कर सके जिसे ज़िंदगी भी नज़रअंदाज़
हो उसे भी तुझ पर नाज़ ; तारीफ़ में निकले बस यही अल्फ़ाज़…
आफ़रीन आफ़रीन ।



Comments